सलोन थाने में एफआईआर ऑनलाइन अपलोड न होने के आरोप
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Published - 07 September 2026 44 views
सलोन थाने में एफआईआर ऑनलाइन अपलोड न होने के आरोप
पुलिस कार्यप्रणाली पर उठे सवाल,मुकदमा दर्ज होने के चार-पांच दिन बाद भी सिस्टम पर नहीं दिखतीं कई एफआईआर, शिकायतों के निस्तारण और रात्रि गश्त को लेकर भी सवाल
नेशनल न्यूज १रायबरेली रिपोर्ट कपिल त्रिपाठी
सलोन (रायबरेली)। सलोन कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि थाना क्षेत्र में मुकदमा दर्ज होने के बाद भी कई मामलों की एफआईआर निर्धारित समय के भीतर ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड नहीं की जा रही है। स्थिति यह बताई जा रही है कि 24 घंटे तो दूर, कई मामलों में मुकदमा दर्ज होने के चार-पांच दिन बाद तक भी एफआईआर ऑनलाइन दिखाई नहीं देती। इससे पुलिस की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली को लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं।स्थानीय स्तर पर सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी 2026 से अब तक सलोन थाने में दर्ज 21 एफआईआर—मुकदमा संख्या 5, 29, 45, 81, 87, 98, 117, 171, 191, 208, 214, 218, 223, 231, 236, 244, 246, 252, 257, 262 और 263—को ऑनलाइन सिस्टम पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराए जाने का आरोप लगाया जा रहा है।हालांकि इन मामलों में वास्तविक स्थिति क्या है और किन तकनीकी अथवा प्रशासनिक कारणों से रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हुए, इसका आधिकारिक स्पष्टीकरण संबंधित पुलिस अधिकारियों से लिया जाना अभी बाकी है।एफआईआर ऑनलाइन न होने से उठ रहे कई सवाल एफआईआर किसी भी आपराधिक मामले की प्रारंभिक कानूनी कार्रवाई का महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। ऐसे में यदि मुकदमा दर्ज होने के बाद उसकी प्रति ऑनलाइन उपलब्ध नहीं होती है तो शिकायतकर्ता और आम नागरिकों के बीच पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक हैविशेषकर ऐसे मामलों में, जिनमें पीड़ित पक्ष कार्रवाई की स्थिति जानने के लिए ऑनलाइन रिकॉर्ड देखना चाहता है, वहां जानकारी उपलब्ध न होने से असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है। पीड़ितों का आरोप है कि कई मामलों में पुलिस की ओर से शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें लंबे समय तक लंबित रखा जाता है। थाना परिसर में शिकायतों का अंबार होने की चर्चाओं के बीच पुलिस कर्मियों की कथित मनमानी और शिकायतकर्ताओं को समय पर जानकारी न मिलने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।कमजोर रात्रि गश्त और चौराहों पर पुलिस की मौजूदगी पर सवाल सलोन कस्बे और आसपास के प्रमुख चौराहों पर रात्रि गश्त तथा पुलिस की सक्रियता को लेकर भी स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं। आरोप है कि कई प्रमुख स्थानों पर पुलिस की नियमित मौजूदगी दिखाई नहीं देती, जिसके चलते रात के समय संदिग्ध गतिविधियों की आशंका बनी रहती है।वहीं, कस्बे के अंदर भारी और ओवरलोड वाहनों के प्रवेश को लेकर भी लोगों में नाराजगी है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि प्रमुख चौराहों और संपर्क मार्गों पर नियमित पुलिस निगरानी हो तो ओवरलोड वाहनों की आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकता है।
यूपी कॉप एप पर एफआईआर उपलब्ध न होने का आरोप पीड़ितों की ओर से लगाया जा रहा है कि यूपी कॉप एप अथवा संबंधित ऑनलाइन पुलिस सिस्टम पर कुछ एफआईआर की प्रतियां सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैंहालांकि किसी एफआईआर का ऑनलाइन दिखाई न देना तकनीकी समस्या, डेटा अपलोड में देरी अथवा अन्य प्रशासनिक कारणों से भी हो सकता है। इसलिए इस संबंध में पुलिस विभाग का आधिकारिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है।विवेचना और अंतिम आख्या को लेकर भी चर्चाएं विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि कुछ ऐसे मुकदमों को ऑनलाइन सार्वजनिक करने में देरी की जाती है, जिनमें विवेचना के दौरान नामजद आरोपियों के संबंध में अंतिम आख्या अथवा नाम निकालने जैसी कार्रवाई प्रस्तावित होती है। हालांकि यह आरोप फिलहाल सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं तक सीमित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सलोन थाने में दर्ज प्रत्येकएफआईआर को नियमानुसार समय से ऑनलाइन अपलोड किया जा रहा है या फिर कुछ मुकदमों को जानबूझकर सार्वजनिक रिकॉर्ड से दूर रखा जा रहा है? यदि तकनीकी अथवा प्रशासनिक कारणों से देरी हो रही है तो पुलिस विभाग को इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि लोगों के बीच पैदा हो रही शंकाओं पर विराम लग सके।एसपी के निर्देशों पर भी उठे सवाल पुलिस अधीक्षक रवि कुमार की ओर से कानून-व्यवस्था, रात्रि गश्त, अपराध नियंत्रण और शिकायतों के त्वरित निस्तारण को लेकर लगातार निर्देश दिए जाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में यदि सलोन थाने में एफआईआर ऑनलाइन अपलोड करने, रात्रि गश्त और शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह स्थानीय स्तर पर पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।अब देखने वाली बात होगी कि इन आरोपों पर उच्चाधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं और क्या ऑनलाइन रिकॉर्ड की जांच कर यह स्पष्ट किया जाता है कि जनवरी 2026 से अब तक बताई जा रही 21 एफआईआर आखिर ऑनलाइन सिस्टम पर क्यों उपलब्ध नहीं हैं।
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